बिहार की अनुसूचित जनजातियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व: एक विश्लेषण

Authors

  • मनीष कुमार शोध छात्र, राजनीति विज्ञान विभाग,टी. एम. बी. यु., भागलपुर
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DOI:

https://doi.org/10.71366/ijwos03032647812

Keywords:

बीजशब्द: अनुसूचित जनजाति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आरक्षण व्यवस्था, लोकतांत्रिक सहभागिता, लोकसभा प्रतिनिधित्व, राजनीति

Abstract

बिहार की अनुसूचित जनजातियाँ राज्य की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना, ऐतिहासिक विरासत तथा क्षेत्रीय विविधता का एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण अंग हैं। यद्यपि इनकी जनसंख्या का अनुपात अपेक्षाकृत कम (लगभग 1–1.5 प्रतिशत) है, फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रतिनिधित्व का प्रश्न केवल संख्यात्मक आधार पर नहीं, बल्कि समानता, न्याय और समावेशन के सिद्धांतों पर आधारित होता है। इस दृष्टि से बिहार में अनुसूचित जनजातियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व एक गंभीर अकादमिक और नीतिगत विमर्श का विषय बन जाता है। भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण, राजनीतिक संरक्षण तथा सामाजिक न्याय के प्रावधानों का उद्देश्य इन समुदायों को मुख्यधारा की राजनीतिक प्रक्रिया में सहभागी बनाना है, किन्तु यह आवश्यक है कि इन संवैधानिक उपायों की वास्तविक प्रभावशीलता का विश्लेषण किया जाए। प्रस्तुत शोध-लेख में बिहार की विधान सभा और लोकसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, निर्वाचन क्षेत्रों के आरक्षण की संरचना, दलगत प्रतिस्पर्धा की प्रकृति, चुनावी व्यवहार की प्रवृत्तियाँ तथा नेतृत्व-निर्माण की प्रक्रिया का विस्तृत अध्ययन किया गया है। अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र मात्र प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने का साधन हैं या वे जनजातीय समाज की आकांक्षाओं और समस्याओं को नीति-निर्माण के केंद्र में लाने में सक्षम रहे हैं। राजनीतिक दलों की रणनीतियों, घोषणापत्रों, उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया तथा चुनाव प्रचार में जनजातीय मुद्दों की प्रस्तुति का विश्लेषण इस बात को समझने में सहायक है कि जनजातीय मतदाताओं को किस प्रकार राजनीतिक विमर्श में स्थान दिया जाता है। शोध में यह भी परीक्षण किया गया है कि निर्वाचित जनजातीय प्रतिनिधियों की भूमिका केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति तक सीमित है या वे विधायी बहसों, विकास योजनाओं और संसाधन-वितरण की प्रक्रिया में सक्रिय हस्तक्षेप कर पाए हैं। सामाजिक-आर्थिक संकेतकों जैसे शिक्षा का स्तर, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, भूमि-अधिकार, वनाधिकार, रोजगार के अवसर तथा बुनियादी ढाँचे के विकास को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़कर यह आकलन किया गया है कि क्या प्रतिनिधित्व ने वास्तविक जीवन-स्तर में सकारात्मक परिवर्तन उत्पन्न किए हैं। साथ ही, पंचायत राज संस्थाओं और स्थानीय निकायों में जनजातीय भागीदारी, महिला प्रतिनिधित्व, नागरिक समाज की सक्रियता तथा सामाजिक आंदोलनों की भूमिका को भी विश्लेषण के दायरे में शामिल किया गया है।

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Published

2026-03-11

How to Cite

[1]
मनीष कुमार , “बिहार की अनुसूचित जनजातियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व: एक विश्लेषण”, Int. J. Web Multidiscip. Stud. pp. 242-251, 2026-03-11 doi: https://doi.org/10.71366/ijwos03032647812 .