मुगल पतन से 1857 के विद्रोह तक बिहार में राजनीतिक परिवर्तन और उसका व्यापार पर प्रभाव
DOI:
https://doi.org/10.71366/ijwos03032692356Keywords:
बीजशब्द: मुगल पतन, क्षेत्रीय शक्ति, बंगाल नवाब, जमींदारी, राजस्व नीति, कंपनी शासन, व्यापारिक एकाधिकार, पटना व्यापार
Abstract
अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत भारतीय इतिहास में गहरे राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक परिवर्तनों का काल मानी जाती है। 1707 ई. में औरंगज़ेब की मृत्यु के साथ ही मुगल साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी। लंबे समय तक चले युद्धों, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, उत्तराधिकार संघर्षों और प्रांतीय सूबेदारों की बढ़ती स्वायत्तता के कारण मुगल शासन की एकता और नियंत्रण कमजोर होता गया। परिणामस्वरूप भारत के विभिन्न भागों में क्षेत्रीय शक्तियों का उदय हुआ और अनेक प्रांतों में स्थानीय शासकों तथा नवाबों ने अपेक्षाकृत स्वतंत्र शासन स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया। इस राजनीतिक विघटन का प्रभाव केवल सत्ता संरचना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव आर्थिक जीवन, व्यापारिक गतिविधियों, राजस्व व्यवस्था तथा बाजार प्रणाली पर भी पड़ा। इसी व्यापक ऐतिहासिक परिवर्तन के संदर्भ में बिहार का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण था। भौगोलिक दृष्टि से बिहार गंगा के उपजाऊ मैदानों में स्थित था और यह क्षेत्र प्राचीन काल से ही कृषि उत्पादन, आंतरिक व्यापार और नदी-आधारित परिवहन का प्रमुख केंद्र रहा था। गंगा, कोसी, गंडक और सोन जैसी नदियाँ न केवल कृषि के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रदान करती थीं, बल्कि ये व्यापारिक मार्गों के रूप में भी अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। इन नदियों के माध्यम से बिहार का संपर्क बंगाल, उत्तर भारत और मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों से बना हुआ था। फलस्वरूप यहाँ अनाज, नमक, कपड़ा, अफीम, चीनी, लाख तथा अन्य कृषि और हस्तशिल्प उत्पादों का व्यापक व्यापार होता था। मुगल साम्राज्य के कमजोर पड़ने के साथ-साथ प्रशासनिक नियंत्रण में कमी आई और प्रांतीय स्तर पर नई शक्ति संरचनाएँ विकसित होने लगीं। बंगाल के नवाबों के अधीन बिहार भी उनके प्रशासनिक क्षेत्र का महत्वपूर्ण भाग था। नवाबों की राजस्व नीतियों, व्यापारिक करों तथा स्थानीय जमींदारों की भूमिका ने बिहार की आर्थिक संरचना को प्रभावित किया। इसी काल में व्यापारिक गतिविधियों में निजी व्यापारियों, साहूकारों और स्थानीय बाजारों की भूमिका भी अधिक स्पष्ट होकर सामने आई। साथ ही, पटना, मुंगेर और भागलपुर जैसे नगर व्यापारिक केंद्रों के रूप में उभरने लगे, जहाँ से विभिन्न वस्तुओं का आंतरिक तथा बाहरी व्यापार संचालित होता था।
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